Thursday, 21 May 2020
ये आँसू (नज़्म)
Wednesday, 13 May 2020
एक नया आदमी (नज़्म)
एक नया आदमी (नज़्म)
अपने लिए आप अपनी कहानी लिखना होगा
अपने अंदर का टूटा अपने आप समेटना होगा
आप ही अपने आप को समझना होगा
वक़्त रहते एक नया आदमी बनना होगा
ताउम्र लोग एक जैसे रहे तो रहे कैसे
कली गर चाहे तो कली बनी रहे तो रहे कैसे
खुद तो तुम बदलोगे ही
उसका भी मिजाज़ बदल जाएगा
सिर्फ तुम्हारा नहीं
उसकी मोहब्बत का भी अंदाज़ बदल जायगा
हमारा रिश्ता इसलिए नहीं टूटा की
ग़लत तुमने किया या हमने किया
सच तो ये है
ना तुमने कुछ किया ना हमनें कुछ किया
जिंदिगी को हमने कुछ इस तरह बसर कर दिया
सोचा तो किया नहीं
और जब किया बिना सोचे कर दिया
कभी हम माज़ी से लिपटे रहे
कभी माज़ी हमसे लिपटा रहा
पाँव तो थक के रुक गए थे
और एक सर है जो दीवार से टकराता रहा
एक हिचक है जो कुछ नहीं करने देती
और एक ख़्वाब है जो रातों को तड़पाता रहा
ज़ेहन घर है सिर्फ दो ख्यालों का
कुछ उम्रदराज़ों का कुछ नौजवानों का
पहला मुझे भींचे है
और दूजा मुझे खींचे है
दूजे की जानिब बढ़ना होगा
कुछ बिखरे हुए ख़्वाब, टूटे हुए आईने
फिर से जोड़ना होगा
वक़्त रहते एक नया आदमी बनना होगा
नज़र
अम्मी (नज़्म )
अम्मी
कभी सितारों का आसमां लगती हैं
कभी भटकों का मकाँ लगती हैं
कभी बेज़ुबानों की ज़बां लगती हैं
कभी ख़ुदा का तर्जुमाँ लगती है
मेरे चमन की बागबाँ लगती हैं
खुशियों की कहकशां लगती हैं
यूँ तो अम्मी बड़ी सख़्त-जाँ लगती हैं
पर गौर करो तो ऐसी कहाँ लगती हैं
नज़र से दूर रहे या नज़र के पास रहे
मुझ पर उनकी दुआओं का लिबास रहे
शाम ढले जब भी दिल मेरा उदास रहे
उनके क़दमों की आहट आस पास रहे
यूँ तो शिकवे उनको चंदा बेटा से पचास रहे
पर डाँट में भी ममता की मिठास रहे
मेरे पके हुए बाल इसी पशोपेश में रहते हैं
बच्चा क्यों बुलाती हैं अम्मी सोचते रहते हैं
बदनसीब से दिल को परदेस में खुश किये रहते हैं
पर माँ के दर्द का एक टुकड़ा जेब में लिये रहते हैं
-नज़र
घर के बरतन (नज़्म )
अब और कैसे क़यामत के आसार नज़र में आएंगे
अब तो लगता है बर्तन धो-धो के दोज़ख में जायँगे
कमबख़्त तेल लगी कढ़ाई रोज़ मुँह चिढ़ाती है
झगड़ती है खनकती है पर बाज़ नहीं आती है
प्रेशर कुकर से लिपटे चावल मुस्कुराते रहते हैं
मुझ ग़रीब का बेइंतेहा पसीना बहाते रहते हैं
बच्चों के दूध की बोतलें जैसे इम्तिहान लेती हैं
प्यालियाँ घुलते नहीं धुलती जब ठान लेती हैं
नौ दस प्लेटों का जनाज़ा अब तक निकल चुका है
आठ ही तो गिलास थे पांच का दम घुट चुका है
लिल्लाह शीशे की कटोरियाँ पास आते डरती हैं
धोने लगो तो इन्ना लिल्लाह पढ़ती हैं
मियां भी कहाँ इन परेशानियों में पड़ गए
पीठ अकड़ गयी खड़े खड़े घुटने जकड़ गए
- नज़र
मज़दूरों के नाम (नज़्म )
कुछ दिनों से रोज़ी उन्हें पहचानती नहीं
आँख फेरती है ऐसे जैसे जानती नहीं
हाल बदक़िस्मतों का कुछ ऐसा है
जैसे रात से चांदनी चली जाए
जैसे सुबह से घूप चली जाए
जैसे आँखों से कोई ख्वाब बिछड़ जाए
जैसे इश्क़ से कोई माशूक बिगड़ जाए
फिरते हैं दर बदर अपनी दुनिया लिए हुए
बढ़ते हैं हर क़दम रुख घर का किये हुए
सब का घर बनाया अपना न बना सके
पराये शहर में रह के दुनिया न सजा सके
उम्मीद है चंद दिनो में
क़िस्मत पे लगा लाक डाउन खुल जाये
बहारें झूम के आएं
कारोबार-ए-जहाँ फिर से चल जाए
-नज़र
किताब ए अदब (नज़्म )
भटकी हुई कहानी
इस से पहले की एक भटकी हुयी
कहानी के किरदार हो जाएँ
आओ फिर से पढ़े हम किताब ए अदब
और समझदार हो जायें
किसको खबर थी वक़्त इतनी जल्दी बदल जाएगा
अदावत का अजगर हमें कच्चा निगल जायगा
झूठ ओ फरेब का दलदल मैदान-ए-अमल हो जायेगा
अख़लाक़ का घर बदतमीज़ी का महल हो जायगा
आँखों की मुरव्वत ने दम तोड़ दिया किसी कोने में
अब फर्क नहीं बचा इंसान और हैवान होने में
नर्म अल्फ़ाज़ मुहज़्ज़ब लहजे हिक़ारत की नज़र हो गए
मंज़िल पे पहुँचें मुसाफिर फिर से मंज़िल को मुंतज़र हो गए
अब तो हर जवाब पे सवाल करना फ़ैशन सा हो गया है
ए मेरे प्यारे वतन तुझे न जाने क्या हो गया है
जैसे पत्थर हो तेरे सीने में कोई जज़्बात नहीं
वक़्त ये भी बदलेगा मेरे अहले वतन कोई बात नहीं
-नज़र
मौलवी साहब से गुफ्तगू (नज़्म )
मैंने कहा आप आलिम-ए-दीन हैं
मुझे ज़िंदगी का राज़ बता दीजिए
ज़िंदगी ख़ुशी के नग़मे गाने लगे
ऐसा कोई साज़ बता दीजिए
बात काटी और कहने लगे पहले
मेरे भाई के लड़के की नौकरी लगा दीजिए
मैंने भी बात काटी और पूछा
हुज़ूर ज़िंदगी और मौत क्या ऊपर वाले के हाथ है
कहने लगे जनाब यह भी कोई पूछने वाली बात है
उसकी मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता
चाँद क्या सूरज क्या एक पुर्ज़ा भी नहीं हिलता
मैं दबे लफ़्ज़ों में बुदबुदाया
तो क्या उदास बच्चों के आँसू का भी ज़िम्मेदार है ख़ुदा
अगर आपकी बात सच हैं तो ख़ुद भी गुनेहगार है ख़ुदा
तैश में आ गए मौलवी साहब और भड़क के बोले
आप बड़े नाफ़रमान लगते हैं
खुदा के खौफ से डरिये
सब कुछ खुदा पर छोड़ रखते हैं
आप भी तो कुछ करिये
मैंने कहा गर खुदा ने सब लिख दिया है पहले से
उसका लिखा मैं अदना कैसे मिटा सकता हूँ
मैं तो ख़ुद दूर हूँ एक क़दम ढहने से
कारोबार-ए-ख़ुदा में टांग कैसे अड़ा सकता हूँ
कहने लगे आप दुआ माँगिए हाथ उठा के
वो आपकी क़िस्मत पलट दे शायद
आप रोज़ इल्तेजा कीजिये सर झुका के
वो हाथ की लकीरों को उलट दे शायद
मैं कहा लेकिन ग़रीब के बच्चे तो रोज़ दुआ माँगते हैं
और उनका क्या जो भूखे मुँह आसमान ताकते हैं
कहने लगे मोहतरम क़ुबूल नहीं होती सबकी दुआएँ
माफ़ कीजिएगा पर माफ़ नहीं होती सबकी खताएँ
वो बंदो को आज़माता भी है
उठते हुओ को गिरता भी है
मैंने कहा
लेकिन मैं ऐसे ख़ुदा का तस्सुवर नहीं कर सकता
अपनी बनाई चीज़ों को वो सजा नहीं दे सकता
कहने लगे
मग़रिब की नमाज़ का वक़्त हो गया है मैं चलता हूँ
आप गुमराह हैं आपके ठीक होने की दुआ करता हूँ
मेरा हसीन चेहरा बुझा हुआ चराग़ हो गया
मेरा बचा हुआ वजूद भी दाग़-दाग़ हो गया
हिम्मत करके एक बार फिर जो होना चाहा मुख़ातिब
एक पंडित जी दिख गए और मैं बढ़ गया उनकी जानिब
-नज़र
अंदर का शोर Nazm
अंदर का शोर आजिज़ है जिस्म दिल पे इतना ज़ोर है धड़कन न समझ ये मेरे अंदर का शोर है ये शोर क्यों है क्या हक़ीक़त कहूँ मैं समझ ले ख्व...
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सोचो तो ये बहाने की अपनी एक अदा है ये सच का भी दोस्त है झूट का भी सगा है कभी लगे के जैसे किसी की साज़िश है और कभी एक बेमिसाल हुनर की न...
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अंदर का शोर आजिज़ है जिस्म दिल पे इतना ज़ोर है धड़कन न समझ ये मेरे अंदर का शोर है ये शोर क्यों है क्या हक़ीक़त कहूँ मैं समझ ले ख्व...
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