भटकी हुई कहानी
इस से पहले की एक भटकी हुयी
कहानी के किरदार हो जाएँ
आओ फिर से पढ़े हम किताब ए अदब
और समझदार हो जायें
किसको खबर थी वक़्त इतनी जल्दी बदल जाएगा
अदावत का अजगर हमें कच्चा निगल जायगा
झूठ ओ फरेब का दलदल मैदान-ए-अमल हो जायेगा
अख़लाक़ का घर बदतमीज़ी का महल हो जायगा
आँखों की मुरव्वत ने दम तोड़ दिया किसी कोने में
अब फर्क नहीं बचा इंसान और हैवान होने में
नर्म अल्फ़ाज़ मुहज़्ज़ब लहजे हिक़ारत की नज़र हो गए
मंज़िल पे पहुँचें मुसाफिर फिर से मंज़िल को मुंतज़र हो गए
अब तो हर जवाब पे सवाल करना फ़ैशन सा हो गया है
ए मेरे प्यारे वतन तुझे न जाने क्या हो गया है
जैसे पत्थर हो तेरे सीने में कोई जज़्बात नहीं
वक़्त ये भी बदलेगा मेरे अहले वतन कोई बात नहीं
-नज़र
No comments:
Post a Comment