Monday, 20 July 2020

अंदर का शोर Nazm

अंदर का शोर

आजिज़ है जिस्म दिल पे इतना ज़ोर है
धड़कन न समझ ये मेरे अंदर का शोर है
ये शोर क्यों है क्या हक़ीक़त कहूँ मैं
समझ ले ख्वाबों पे छाई घटा घनघोर है 

शोर जो किसी ज़िम्मेदारी के नीचे दबा है
शोर जो झूटी खामोशी के जामे में खड़ा है 
शोला न बनने पाए ज़ेरे लब तक न जाए 
शोर जो आंखो में शोले बनने पे अड़ा है । 

इक उम्र खो के हमने सीखा सब्र करना 
साहिल पे खड़े रह के कश्ती की देखना 
या रब न जाने क्या वजह है आज 
जी चाहे है इस शोर को आज़ाद करना 

ग़ज़ल मुकम्मल 
1222 1222 1222 1222 मुकम्मल

कभी उसकी/ कमी को मैं/ कभी चेहरा /परखता हूँ   
बुरा कोई/ नहीं दिखता/ नज़र जो ख़ुद/ पे करता हूँ 

अकेले तुम/ नहीं आना/ अधूरी बा/ ले आना
बड़ी मैं मुद/दतों से पू/री करने को /तड़पता हूँ  

ज़माना बी/ जाता है/ तेरा ख़या/ आए बिन 
धड़कने दिल/ ये लगता है /गली तेरी/ गुज़रता हूँ  

बज़ारों में /उठाये गठ/रि ईमा बे/ देते हैं 
तमाशा / दुनिया दे/खता दिन रा/ रहता हूँ

घटा बोले/है ज़ुल्फ़ें ते/री बल खाती/तो होंगी ही 
मचलता है/ जिगर मेरा/ नहीं मैं दे/ पाता हूँ 

किताबें चं/ सौदा घा/टे का कुछ तल/खियाँ भी हैं 
झुलसता हूँ/ बसर मैं ज़िं/दिगी को यूँ/ ही करता हूँ 
-नज़र 





ग़ज़ल मुकम्मल 
2122 / 1122 / 1122 / 22 मुकम्मल 

ढ़ब खिज़ाओं का बहारों कि तरह होता है  
आदमी इशक में बच्चों कि तरह होता है 

हम से है रात ख़फ़ा नींद कहाँ से आए 
इक मिरा दिन है कि सालों कि तरह होता है

दर्द है दिल में मिरे जितना सुकूँ है उतना   
चैन पल का हो तो काँटों कि तरह होता है 

हमसे ढूँढे बना तुमने बताया पता 
कुछ बसर राह-गुज़ारों कि तरह होता है 

हम शिकायत भी करें तो वो दुआ बन जाए  
दिल ग़रीबों का दरियाओं कि तरह होता है 

कारनामों का भी अपने रखिए इक खाता
काम ये बाक़ी के कामों की तरह होता है  

सोच की होती नहीं मुझसे किफ़ालत देखो   
अब ये धंधा भी मशीनों की तरह होता है 

नज़र 

किफ़ालत- परवरिश 
ढ़ब - Style 
ग़ज़ल  मुकम्मल 2122 / 2122 / 2122 / 212 मुकम्मल 

वो मोहब्बत हम पे जतलाएँ नहीं तो ना सही 
बिगड़ी हुयी बात सुलझाएँ नहीं तो ना सही 

जो मिला मुझको ज़माने से है दोहराता हूँ मै  
ख़ूबसूरत गर मेरी बातें नहीं तो ना सही 

मुझ को आता ही नहीं बातें सजा के बोलना  
मेरी दिलचस्प है मुलाक़ातें नहीं तो ना सही 

दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा बनते हैं हम   
मेरे हिससे में तेरी साँसें नहीं तो ना सही 

मिलने को यूँ तो मिला करती हैं उनसे आँखें 
मेरा हमदम मुझको पहचानें नहीं तो ना सही 

मेरे ढलते आँसूओ में से मुकम्मल है जहाँ
मेरे हिससे आयी बरसातें नहीं तो ना सही 

दिल में सूरत कब से उनकी घूमता हूँ मैं लेके  
अपना चेहरा आप दिखलाएँ नहीं तो ना सही 

लोग तो दुनिया में सब पा लेते कुछ खोये बिना 
सब खो कर भी मिली सौग़ातें नहीं तो ना सही 

आसमा इक मैं ज़मीं पर ही सजाए रहता हूँ 
मेरे हिससे चाँदनी-रातें नहीं तो ना सही -नज़र 

अंदर का शोर Nazm

अंदर का शोर आजिज़ है जिस्म दिल पे इतना ज़ोर है धड़कन न समझ ये मेरे अंदर का शोर है ये शोर क्यों है क्या हक़ीक़त कहूँ मैं समझ ले ख्व...