Wednesday, 13 May 2020

मज़दूरों के नाम (नज़्म )

कुछ दिनों से रोज़ी उन्हें पहचानती नहीं

आँख फेरती है ऐसे जैसे जानती नहीं 

हाल बदक़िस्मतों का कुछ ऐसा है  

जैसे रात से चांदनी चली जाए 

जैसे सुबह से घूप चली जाए 

जैसे आँखों से कोई ख्वाब बिछड़ जाए 

जैसे इश्क़ से कोई माशूक बिगड़ जाए 

फिरते हैं दर बदर अपनी दुनिया लिए हुए

बढ़ते हैं हर क़दम रुख घर का किये हुए 

सब का घर बनाया अपना न बना सके

पराये शहर में रह के दुनिया न सजा सके 

उम्मीद है चंद दिनो में 

क़िस्मत पे लगा लाक डाउन खुल जाये 

बहारें झूम के आएं 

कारोबार-ए-जहाँ फिर से चल जाए 

-नज़र

 


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