अंदर का शोर
आजिज़ है जिस्म दिल पे इतना ज़ोर है
धड़कन न समझ ये मेरे अंदर का शोर है
ये शोर क्यों है क्या हक़ीक़त कहूँ मैं
समझ ले ख्वाबों पे छाई घटा घनघोर है
शोर जो किसी ज़िम्मेदारी के नीचे दबा है
शोर जो झूटी खामोशी के जामे में खड़ा है
शोला न बनने पाए ज़ेरे लब तक न जाए
शोर जो आंखो में शोले बनने पे अड़ा है ।
इक उम्र खो के हमने सीखा सब्र करना
साहिल पे खड़े रह के कश्ती की देखना
या रब न जाने क्या वजह है आज
जी चाहे है इस शोर को आज़ाद करना
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