Wednesday, 13 May 2020

घर के बरतन (नज़्म )

अब और कैसे क़यामत के आसार नज़र में आएंगे 


अब तो लगता है बर्तन धो-धो के दोज़ख में जायँगे 


कमबख़्त तेल लगी कढ़ाई रोज़ मुँह चिढ़ाती है 


झगड़ती है खनकती है पर बाज़ नहीं आती है 


प्रेशर कुकर से लिपटे चावल मुस्कुराते रहते हैं 


मुझ ग़रीब का बेइंतेहा पसीना बहाते रहते हैं 


बच्चों के दूध की बोतलें जैसे इम्तिहान लेती हैं


प्यालियाँ घुलते नहीं धुलती जब ठान लेती हैं  


नौ दस प्लेटों का जनाज़ा अब तक निकल चुका है 


आठ ही तो गिलास थे पांच का दम घुट चुका है


लिल्लाह शीशे की कटोरियाँ पास आते डरती हैं


धोने लगो तो इन्ना लिल्लाह पढ़ती हैं 


मियां भी कहाँ इन परेशानियों में पड़ गए 


पीठ अकड़ गयी खड़े खड़े घुटने जकड़ गए


- नज़र 


No comments:

Post a Comment

अंदर का शोर Nazm

अंदर का शोर आजिज़ है जिस्म दिल पे इतना ज़ोर है धड़कन न समझ ये मेरे अंदर का शोर है ये शोर क्यों है क्या हक़ीक़त कहूँ मैं समझ ले ख्व...