Wednesday, 13 May 2020

मौलवी साहब से गुफ्तगू (नज़्म )

मैंने कहा आप आलिम-ए-दीन हैं


मुझे ज़िंदगी का राज़ बता दीजिए


ज़िंदगी ख़ुशी के नग़मे गाने लगे


ऐसा कोई साज़ बता दीजिए


बात काटी और कहने लगे पहले


मेरे भाई के लड़के की नौकरी लगा दीजिए


मैंने भी बात काटी और पूछा


हुज़ूर ज़िंदगी और मौत क्या ऊपर वाले के हाथ है


कहने लगे जनाब यह भी कोई पूछने वाली बात है 


उसकी मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता


चाँद क्या सूरज क्या एक पुर्ज़ा भी नहीं हिलता 


मैं दबे लफ़्ज़ों में बुदबुदाया 


तो क्या उदास बच्चों के आँसू का भी ज़िम्मेदार है ख़ुदा


अगर आपकी बात सच हैं तो ख़ुद भी गुनेहगार है ख़ुदा


तैश में आ गए मौलवी साहब और भड़क के बोले 


आप बड़े नाफ़रमान लगते हैं 


खुदा के खौफ से डरिये


सब कुछ खुदा पर छोड़ रखते हैं 


आप भी तो कुछ करिये


मैंने कहा गर खुदा ने सब लिख दिया है पहले से 


उसका लिखा मैं अदना कैसे मिटा सकता हूँ


मैं तो ख़ुद दूर हूँ एक क़दम ढहने से 


कारोबार-ए-ख़ुदा में टांग कैसे अड़ा सकता हूँ


कहने लगे आप दुआ माँगिए हाथ उठा के


वो आपकी क़िस्मत पलट दे शायद


आप रोज़ इल्तेजा कीजिये सर झुका के 


वो हाथ की लकीरों को उलट दे शायद 


मैं कहा लेकिन ग़रीब के बच्चे तो रोज़ दुआ माँगते हैं


और उनका क्या जो भूखे मुँह आसमान ताकते हैं 


कहने लगे मोहतरम क़ुबूल नहीं होती सबकी दुआएँ


माफ़ कीजिएगा पर माफ़ नहीं होती सबकी खताएँ 


वो बंदो को आज़माता भी है 


उठते हुओ को गिरता भी है 


मैंने कहा 


लेकिन मैं ऐसे ख़ुदा का तस्सुवर नहीं कर सकता 


अपनी बनाई चीज़ों को वो सजा नहीं दे सकता 


कहने लगे 


मग़रिब की नमाज़ का वक़्त हो गया है मैं चलता हूँ 


आप गुमराह हैं आपके ठीक होने की दुआ करता हूँ 


मेरा हसीन चेहरा बुझा हुआ चराग़ हो गया


मेरा बचा हुआ वजूद भी दाग़-दाग़ हो गया   


हिम्मत करके एक बार फिर जो होना चाहा मुख़ातिब


एक पंडित जी दिख गए और मैं बढ़ गया उनकी जानिब 


-नज़र


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