एक नया आदमी (नज़्म)
अपने लिए आप अपनी कहानी लिखना होगा
अपने अंदर का टूटा अपने आप समेटना होगा
आप ही अपने आप को समझना होगा
वक़्त रहते एक नया आदमी बनना होगा
ताउम्र लोग एक जैसे रहे तो रहे कैसे
कली गर चाहे तो कली बनी रहे तो रहे कैसे
खुद तो तुम बदलोगे ही
उसका भी मिजाज़ बदल जाएगा
सिर्फ तुम्हारा नहीं
उसकी मोहब्बत का भी अंदाज़ बदल जायगा
हमारा रिश्ता इसलिए नहीं टूटा की
ग़लत तुमने किया या हमने किया
सच तो ये है
ना तुमने कुछ किया ना हमनें कुछ किया
जिंदिगी को हमने कुछ इस तरह बसर कर दिया
सोचा तो किया नहीं
और जब किया बिना सोचे कर दिया
कभी हम माज़ी से लिपटे रहे
कभी माज़ी हमसे लिपटा रहा
पाँव तो थक के रुक गए थे
और एक सर है जो दीवार से टकराता रहा
एक हिचक है जो कुछ नहीं करने देती
और एक ख़्वाब है जो रातों को तड़पाता रहा
ज़ेहन घर है सिर्फ दो ख्यालों का
कुछ उम्रदराज़ों का कुछ नौजवानों का
पहला मुझे भींचे है
और दूजा मुझे खींचे है
दूजे की जानिब बढ़ना होगा
कुछ बिखरे हुए ख़्वाब, टूटे हुए आईने
फिर से जोड़ना होगा
वक़्त रहते एक नया आदमी बनना होगा
नज़र
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