अम्मी
कभी सितारों का आसमां लगती हैं
कभी भटकों का मकाँ लगती हैं
कभी बेज़ुबानों की ज़बां लगती हैं
कभी ख़ुदा का तर्जुमाँ लगती है
मेरे चमन की बागबाँ लगती हैं
खुशियों की कहकशां लगती हैं
यूँ तो अम्मी बड़ी सख़्त-जाँ लगती हैं
पर गौर करो तो ऐसी कहाँ लगती हैं
नज़र से दूर रहे या नज़र के पास रहे
मुझ पर उनकी दुआओं का लिबास रहे
शाम ढले जब भी दिल मेरा उदास रहे
उनके क़दमों की आहट आस पास रहे
यूँ तो शिकवे उनको चंदा बेटा से पचास रहे
पर डाँट में भी ममता की मिठास रहे
मेरे पके हुए बाल इसी पशोपेश में रहते हैं
बच्चा क्यों बुलाती हैं अम्मी सोचते रहते हैं
बदनसीब से दिल को परदेस में खुश किये रहते हैं
पर माँ के दर्द का एक टुकड़ा जेब में लिये रहते हैं
-नज़र
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