ग़ज़ल मुकम्मल
2122 / 1122 / 1122 / 22 मुकम्मल
ढ़ब खिज़ाओं का बहारों कि तरह होता है
आदमी इशक में बच्चों कि तरह होता है
हम से है रात ख़फ़ा नींद कहाँ से आए
इक मिरा दिन है कि सालों कि तरह होता है
दर्द है दिल में मिरे जितना सुकूँ है उतना
चैन पल का हो तो काँटों कि तरह होता है
हमसे ढूँढे न बना तुमने बताया न पता
कुछ बसर राह-गुज़ारों कि तरह होता है
हम शिकायत भी करें तो वो दुआ बन जाए
दिल ग़रीबों का दरियाओं कि तरह होता है
कारनामों का भी अपने रखिए इक खाता
काम ये बाक़ी के कामों की तरह होता है
सोच की होती नहीं मुझसे किफ़ालत देखो
अब ये धंधा भी मशीनों की तरह होता है
नज़र
किफ़ालत- परवरिश
ढ़ब - Style
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