ग़ज़ल मुकम्मल 2122 / 2122 / 2122 / 212 मुकम्मल
वो मोहब्बत हम पे जतलाएँ नहीं तो ना सही
बिगड़ी हुयी बात सुलझाएँ नहीं तो ना सही
जो मिला मुझको ज़माने से है दोहराता हूँ मै
ख़ूबसूरत गर मेरी बातें नहीं तो ना सही
मुझ को आता ही नहीं बातें सजा के बोलना
मेरी दिलचस्प है मुलाक़ातें नहीं तो ना सही
दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा बनते हैं हम
मेरे हिससे में तेरी साँसें नहीं तो ना सही
मिलने को यूँ तो मिला करती हैं उनसे आँखें
मेरा हमदम मुझको पहचानें नहीं तो ना सही
मेरे ढलते आँसूओ में से मुकम्मल है जहाँ
मेरे हिससे आयी बरसातें नहीं तो ना सही
दिल में सूरत कब से उनकी घूमता हूँ मैं लेके
अपना चेहरा आप दिखलाएँ नहीं तो ना सही
लोग तो दुनिया में सब पा लेते कुछ खोये बिना
सब खो कर भी मिली सौग़ातें नहीं तो ना सही
आसमा इक मैं ज़मीं पर ही सजाए रहता हूँ
मेरे हिससे चाँदनी-रातें नहीं तो ना सही -नज़र
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