ग़ज़ल मुकम्मल
1222 1222 1222 1222 मुकम्मल
कभी उसकी/ कमी को मैं/ कभी चेहरा /परखता हूँ
बुरा कोई/ नहीं दिखता/ नज़र जो ख़ुद/ पे करता हूँ
अकेले तुम/ नहीं आना/ अधूरी बा/त ले आना
बड़ी मैं मुद/दतों से पू/री करने को /तड़पता हूँ
ज़माना बी/त जाता है/ तेरा ख़या/ल आए बिन
धड़कने दिल/ ये लगता है /गली तेरी/ गुज़रता हूँ
बज़ारों में /उठाये गठ/रि ईमा बे/च देते हैं
तमाशा ए/ दुनिया दे/खता दिन रा/त रहता हूँ
घटा बोले/है ज़ुल्फ़ें ते/री बल खाती/तो होंगी ही
मचलता है/ जिगर मेरा/ नहीं मैं दे/ख पाता हूँ
किताबें चं/द सौदा घा/टे का कुछ तल/खियाँ भी हैं
झुलसता हूँ/ बसर मैं ज़िं/दिगी को यूँ/ ही करता हूँ
-नज़र
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