Monday, 20 July 2020

ग़ज़ल मुकम्मल 
1222 1222 1222 1222 मुकम्मल

कभी उसकी/ कमी को मैं/ कभी चेहरा /परखता हूँ   
बुरा कोई/ नहीं दिखता/ नज़र जो ख़ुद/ पे करता हूँ 

अकेले तुम/ नहीं आना/ अधूरी बा/ ले आना
बड़ी मैं मुद/दतों से पू/री करने को /तड़पता हूँ  

ज़माना बी/ जाता है/ तेरा ख़या/ आए बिन 
धड़कने दिल/ ये लगता है /गली तेरी/ गुज़रता हूँ  

बज़ारों में /उठाये गठ/रि ईमा बे/ देते हैं 
तमाशा / दुनिया दे/खता दिन रा/ रहता हूँ

घटा बोले/है ज़ुल्फ़ें ते/री बल खाती/तो होंगी ही 
मचलता है/ जिगर मेरा/ नहीं मैं दे/ पाता हूँ 

किताबें चं/ सौदा घा/टे का कुछ तल/खियाँ भी हैं 
झुलसता हूँ/ बसर मैं ज़िं/दिगी को यूँ/ ही करता हूँ 
-नज़र 




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